Homeइतिहास सेबदायूं का ताजमहल : मकबरा इखलास खां का रोज़ा

बदायूं का ताजमहल : मकबरा इखलास खां का रोज़ा

जिस तरह शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज महल की याद में आगरा में ताजमहल बनवाया उसी तरह अपने शहर में नवाब इखलास खां की बेगम ने अपने शौहर की याद में मकबरे का निर्माण कराया था। जिसे इखलास खां के रोजा के नाम से जाना जाता है। यह अलग बात है कि इस मकबरे को ताजमहल की तरह प्रसिद्धि नहीं मिली।

मकबरा इखलास खां का निर्माण 1094 हिजरी (सन् 1690) में कराया गया। इस मकबरे की लंबाई 152 और चौड़ाई 150 फिट है। ककइया ईटों से तामीर किया गया। यह मकबरा मुगलकाल की यादगार इमारत है।नवाब इखलास खां उर्फ अल्लादीया के वालिद का नाम शेख इब्राहिम किश्वर खां था। इन्हीं के नाम पर मोहल्ला इब्राहिम बसा जो ब्राह्मापुर कहलाता है। इनके दादा शेख कुतुबुद्दीन देश के मशहूर सूफी बुजुर्ग हजरत शेख सलीम चिश्ती थे जो फतेहपुर सीकरी में अकबर के जमाने में उच्च पदों पर आसीन रहे। इखलास खां की पैदाइश शहर के मोहल्ला सोथा में चिश्तियों के खानदानी रंगमहल में हुई। सत्रहवीं सदी में बनवाया गया इखलास खां का मकबरा आज भी उनकी शान-ओ- शौकत का अहसास कराता है। इखलास खां की बेगम द्वारा बनवाया गया यह मकबरा जमीन से छह फिट ऊंचाई पर एक बीघा, 12 बिस्वा और 4 बिस्वांसी में बना है। मकबरे में पांच कब्र इसी परिवार की बनी हुई हैं। असली कब्र मकबरे के नीचे है। ऊपरी हिस्से में हाल के अंदर इन कब्रों के ताबीज बने हैं। मकबरे के चारों कोनों पर ताजमहल की तरह ही बुलंद मीनारें हैं जिनमें ऊपर चढ़ने के लिए सीढि़यां बनी हैं। मकबरे के आसपास कभी बाग और तालाब हुआ करता था, जहां आज आबादी बसी हुई है। 1857 में अंग्रेजों ने आजादी की लड़ाई लड़ने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को इसमें कैद किया था।

मकबरा मखइया जहां

सैयद वंश के शासक सैयद अलाउद्दीन आलम शाह ने 854 हिजरी (सन् 1461) में अपनी मां की कब्र पर निर्माण कराया था। सैयद अलाउद्दीन हिंदुस्तान का शासक था। वह अंतिम समय में राजपाट त्यागकर बदायूं आ गया। मीरासराय इसी शासक की बसाई हुई है।

मकबरा नवाब फरीद शेखूपुर

शेखूपुर किले के निर्माण के कुछ समय बाद नवाब फरीद ने किले के सामने अपनी व अपनी पत्‍‌नी बेगम शाह परवर खानम के लिए अंतिम आरामगाह का निर्माण कराया। यह इमारत सोत नदी के किनारे है। बेगम शाह परवर खानम मुमताज महल की सगी छोटी बहन थीं। 1660 ईसवी में मकबरे का निर्माण हुआ। मकबरे में चार कब्रें हैं।

मकबरा बीबी चमन आरा

मुगलकाल की फनकारी व कला का एक और बेहद नायाब नमूना मकबरा बीबी चमन आरा मोहल्ला सोथा गौंटिया में है। यह मकबरा नवाब फरीद की बेटी चमन आरा की कब्र पर बना है। मकबरे में कब्र का निशान मिट चुका है। मकबरे के बाहर कुआं आज भी मौजूद है जो अब बंद है।

रापड़ वाला गुम्बद

शहर से पश्चिम की ओर कादरी दरगाह के निकट बनी गुम्बदों में सबसे बड़ा गुम्बद रापड़ वाला गुम्बद के नाम से दर्ज है। इसके तीन दरवाजे पूरब, पश्चिम, दक्षिण की ओर हैं। पूरब दरवाजे पर एक शिलालेख लगा है। जिसे शहंशाह हुमायूं के दौर में दौलत खां उर्फ अहमद जमा खां द्वारा बनवाया गया। गुम्बद की ईटों की लंबाई 12 इंच व चौड़ाई नौ इंच है। जबकि गुम्बद की ऊंचाई 75 फिट है।

ध्वस्त हो रही हैं धरोहरें

देखरेख के अभाव में ऐतिहासिक महत्व की यह धरोहरें ध्वस्त होती जा रही हैं। वैसे तो मकबरा इखलास खां, मकबरा मखइया पुरातत्व विभाग में दर्ज है। इसके बावजूद इन इमारतों के संरक्षण के लिए कोई विशेष बंदोबस्त नहीं किए जाते हैं। कुछ समय पहले आगरा के पुरातत्व विभाग ने मकबरा इखलास खां की मरम्मत कराई थी। इसके अलावा किसी इमारत के संरक्षण के लिए सरकारी तौर पर कोई प्रयास नहीं किए गए।

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